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Friday 15 December 2017
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कृष्ण का संरक्षण 

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क्या कभी किसी ने अकेले आनंद का अनुभव किया है? नहीं न? यह इसलिये है क्योंकि आनंद का अनुभव करने के लिए कम से कम दो लोगों की आवश्यकता  होती है। जब हम, अर्थात जीवात्मा, परमपुरुषोत्तम भगवान श्री कृषण की भक्तिपूर्वक सेवा करते हैं, तो हम उस पवित्र प्रेममय सेवा से उत्पन्न परमानंद की अनुभूती करते हैं।

अब प्रश्न है कि हम अपने हृदय में परमात्मा स्वरूप विद्यमान श्री कृष्ण का अनुभव क्यों नहीं कर पाते? इसके लिये सबसे पहले हमें यह समझाना होगा कि हम उनके अंश हैं।  वास्तव में हमारा स्वरुप आनंदमय है। सभी ने कृष्ण की तस्वीर देखी होगी। वे कभी गोप गोपियों के मध्य, कभी गाँय चराते, कभी रास लीला रचाते सदैव आनंदित रहते हैं। कृष्ण सत चित आनंद विग्रह हैं। हम कृष्ण के अंश हैं  अतएव हमें भी आनंदित रहना चाहिये फिर हमारे जीवन अनुभव में दुःख क्यों हैं? इसका कारण यह है कि हमने भौतिक प्रकृति के त्रिगुणों (सत्व ,रज और तम ) को स्वीकार कर लिया है।

इसके अतिरिक्त एक और कठिनाई भी है। बहुत बड़ी कठिनाई! यदि हम स्वयं को कृष्ण का अंश स्वीकार कर भी लें तो भी हम कृष्ण को पूर्ण आत्मसमर्पण नहीं कर पाते। पूर्ण समर्पण का अर्थ है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी कृष्ण हमारी रक्षा करेंगे, यह दृढ़ विश्वास रखना। परन्तु हमारि वृत्ति है कि हम परिवार, रिश्तेदार, समाज आदि से रक्षा की उम्मीद करते हैं और अंततः जब कोई रक्षा नहीं दे पाता तब हार कर कृष्ण के पास आते हैं। हमारी स्थिति द्रोपदी जैसी है। चीर हरण के समय द्रोपदी ने अपनी रक्षा के लिए पहले अपने पाँचो पति, फिर धृतराष्ट्र, फिर भीष्म पितामह आदि कई लोगों से अपनी रक्षा की याचना की। अंततः जब किसी ने रक्षा नहीं की तो अपनी शक्ति का प्रयोग करने का प्रयास किया। जब सब विफल रहा तो द्रौपदी ने अत्यंत असहाय भाव से कृष्ण का गंभीर स्मरण किया। तब भगवान ने उनकी रक्षा की।

हमें याद रखना चाहिए की यदि कृष्ण हमारी उपेक्षा करें तो कोई हमारी रक्षा नहीं कर सकता है और यदि कृष्ण हमारी रक्षा करें तो कोई हमारी हानी नहीं कर सकता। यदि कृष्ण उपेक्षा करें तो बीमार व्यक्ति अच्छी से अच्छी चिकित्सा प्राप्त कर कर भी मर जाता है और यदि कृष्ण बचाना चाहें तो न्यून चिकित्सा से भी व्यकित मृत्यु के मुँह से बच जाता है।

प्रमुख बात यह है कि हमें कृष्ण को पूर्ण समर्पण करना है और पूर्ण समर्पण का प्रमुख सिद्धांत है कृष्ण की रक्षा पर अटूट श्रद्धा। उसी प्रकार जैसे एक बालक माता पिता की रक्षा से पूर्ण आश्वस्त प्रसन्न चित्त रहता है।

सृष्टी द्वारा प्राप्त होने वाली हमारी सभी आवश्यक्ताओं कि पूर्ति भगवान के संचालन से होति है। वस्तुतः कृष्ण हमारी रक्षा हर स्थिति में कर रहे हैं चाहे हम उनके विद्रोही भी क्यों न हों। कृष्ण के संरक्षण के बिना हम एक पल भी जीवित नहीं रह सकते। यदि हम इस तत्थय को स्वीकार करें तो हम सदा प्रसन्न रह सकते हैं।

वास्तव में मन में यह दृढ़ता तब आती है जब हम गुरु और शास्त्रों की वाणी का विनम्र भाव से श्रवण कर उनके द्वारा दिये गये नियमों का निष्ठापूर्वक अनुसरण करते हैं। श्री चैतन्य चरितामृत (म० ली० २२.१००) में श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी कहते हैं–

आनुकूलयस्य संकल्पः प्रतिकूलयस्य वर्जनम्।
रक्षिष्यतीति विश्वासो गोपतृत्वे वरणम् तथा
आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड़विधा शरणागति:॥

अनुवाद: छह भागों में विभाजित समर्पण इस प्रकार हैं – मात्र उन्ही वस्तुओं को स्वीकार करना जो भक्ति सेवा के लिए अनुकूल हों, प्रतिकूल वस्तुओं को अस्वीकार करना, दृढ़ विश्वास रखना की कृष्ण सुरक्षा प्रदान करेंगे, कृष्ण को अपना संरक्षक या स्वामी स्वीकार करना, पूर्ण आत्मसमर्पण और विनम्रता।

प्रतिकूलयस्य वर्जनम् अर्थात हर उस चीज का त्याग करना जो कृष्ण भक्ति में बाधक हो। जैसे – मांसाहार, मद्यापान, व्यभिचार और जूआ। श्रील रूप गोस्वामि उपदेश करते हैं कि आवश्यक्ता से अधिक खाना अथवा आवश्यक्ता से अधिक धन का संग्रह करना, क्षमता से अधिक भौतिक प्रयास करना, ग्राम्य कथा में समय व्यर्थ करना, नियमों का पालन न करना अथवा उनका उद्देश्य जाने बिना उनका पालन करना, भौतिकवादि व्यकतियों का संग करना तथा सांसारिक लालसा रखना, भक्ति के प्रतिकूल हैं।

अनुकुलस्य संकल्पः अर्थात कृष्ण भक्ति में प्रगति करने में सहायक तत्तवों को अपनाना – जैसे नाम जप, साधु संग, भागवत श्रवण, मथुरावास (तीर्थ स्थल में वास करना) तथा मूर्ति पूजा। यह भक्ति की प्रगति में सहायक हैं। श्रील रूप गोस्वामि ‘उपदेशामृत’ नामक पुस्तक में कहते हैं कि उत्साह, दृढ़ता, धैर्य, नियमित साधना, दु:संग त्याग तथा सतसंग भक्ति में प्रगति के लिये अनुकूल हैं।

यह उपाय मन की ढृढ़ता के लिए हैं। दृढ़ता अर्थात धैर्य  और संयम से आध्यात्मिक साधना में जुटे रहना। कृष्ण भावनामृत में यह ढृढ़ता अति आवश्यक है। कृष्ण साधक को अपने दिव्य धाम में वापस ले जाने के लिए तथा मायामय जगत के प्रबल द्वंद्व से बचाने के लिये बुद्धि प्रदान करते हैं। कृष्ण ऐसी सुविधा नहीं देते जो अंततः आध्यातमिक पतन का कारण बने। कृष्ण हमारे सर्वप्रथम हितैशि हैं। हमें केवल निश्काम समर्पण करने की आवश्यकता है। यह नहीं की ओह! कृष्ण भावनामृत में मन में जैसा सोचा था वैसा परिणाम नहीं आ रहा, तो इसे छोड़ देना चाहिए। यह तो वैसी ही स्थिति हो गयी जैसे कोई नव विवाहित वधू विवाह के तुरंत बाद ही संतान की अपेक्षा करे! धैर्य और संयम से वह यदि पति की प्रीति का पात्र बने तो समय के अंतराल में अवश्य वह शिशू को जन्म देगी। उसी  प्रकार यदि हम कृष्ण भावनामृत में हैं तो परिणाम भी अवश्य मिलेगा। केवल धैर्यपूर्क साधना में लीन रहना होगा।




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