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Wednesday 26 February 2020
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क्या भक्ति पत्थर को पूजना है? एक संवाद

a11-folk-class (1)प्रचारक के पास मन में अनेक शंकाएँ लिए एक व्यक्ति आया।

साधारण व्यक्ति: प्रभुजी, जब किसान श्रम करता है तो अन्न उत्पन्न होता है। इस के लिए कोइ ईश्वर से क्यों प्रार्थना करे? मूर्ती के सम्मुख फूल, फल, पूजा सामग्री द्वारा कोई क्यों भगवान से याचना करे? आखिर एक निर्जीव पत्थर से रचित मूर्ती में क्या क्षमता है। हमारी आवश्यक्ताओं की पुर्ती होती है हमारी शक्तियों से। यदि कोई श्रम न करे और दिनभर पूजा पाठ़ में लगा रहे, तो कोई पदार्थ उपलभ्ध न हो।

प्रचारक: अापकी विचारधारा अत्यंत संकुचित है। आपने जीवन का गहराई से अनुसंधान नहीं किया न ही आचार्य से ज्ञान प्राप्त किया। इस कारण वश आपकी बातों से अज्ञान प्रकट़ होता है। हमारे आचार्य श्रील प्रभुपाद के दिये इस विश्लेषण को सुनें।

अन्न सृष्टी की एक विशाल व्यवस्था द्वारा उत्पन्न होता है जिसमें किसान और उस्का श्रम क्षुद्र लेशमात्र हैं। भूमी तथा उस्में विद्यमान महत्वपूर्ण पोशक तत्त्व, वायु, जल, सूर्य का प्रकाश, एवं सर्वप्रमुख फलप्रद बीज, इन में से किसी का भी निर्माण अथवा संचालन मनुष्य नहीं करते।

यदि और गहराइ से देखें तो किसान का शरीर, उस शरीर का बल व क्षमताएँ, उसकी बुद्धी, पर्यावरण को पहचानने और प्रयोग करने की शक्ति यह सब किसान को प्रदान की गईं हैं। उन क्षमाताओं का कारण वह स्वयं नहीं है। यदि देखा जाए तो बीज की व्यापक परिवर्तनशीलता जिसके द्वारा वह भूमी, जल, प्रकाश व वायु का प्रयोग कर पौधे का रूप धारण करता है और फ़िर  अद्भुत निपुणता से फूल व फल उद्भव करता है जिनमें से और बीज उत्पन्न होते हैं, यह सब प्रकृति के चमत्कारी कारनामें हैं जिनका लाभ मनुष्य उठ़ाता है।

इसी प्रकार यदि आप ग्रह पर वायु, जल और प्रकाश के संतुलित और पर्याप्त वितरण के बारे में चिंतन करें तो एक अति सूक्ष्म एवं प्रबल प्रक्रिया का अवलोकन होगा जो विद्यमान है किंतु प्रकट़ नहीं। प्रभू की इस महान संरचना को समझने के लिए मनुष्य का शरीर विशेषकर उपयुक्त है। विकसित चेतना होने के कारण मनुष्य न केवल भौतिक रूप से अपितु दिव्य दृष्ट़िकोण से भी अपने आंतरिक और बाह्य अस्तितव को पहचान सकता है। जब एक व्यक्ति भ्रम से जागृत होता है तो वह उस परम् ईश्वर के प्रति, जो सबका स्रोत है, प्रगाढ़ कृतज्ञता का अनुभव करता है जिसकी अभिव्यक्ति भक्ति भावनाओं में होति है। भगवान श्री कृष्ण गीता के दसवें अध्याय में इस बात कि तुष्टि करते हैं,

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता:॥८॥

मैं सभी आध्यात्मिक व भौतिक लोकों का स्रोत हूँ। सब मुझ ही से उद्भव है। वे बुद्धिमान जो यह भलिभाँति समझते हैं, मेरी भक्ति सेवा में संलग्न होते हैं और हृत्पूर्वक मेरी अाराधना में तत्पर हो जाते हैं।

यदि मनुष्य ईश्वर की देन को भोगने में लीन है और भक्ति से विमुख्ख, तो उसकी चेतना प्राणी समान हीन है। प्राणि भी उपकार व्यक्त करते हैं किंतु मनुष्य स्वार्थ में चूर, केवल शोषण करना जानते हैं।

साधारण व्यक्ति: क्या इसका अर्थ यह है कि हम सब काम छोड़ कर पूजा पाठ मे लग जाएँ?

प्रचारक: भक्ति का अर्थ यह नहीं की सब कर्म छोड़ देना। शरीर के रख रखाव के लिए भी कर्म अनिवार्य है। किंतु कर्म का उद्देश्य  महत्चपूर्ण है। यदि हम अपने कर्मों द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की तृप्ति की इच्छा रखते हैं तो हमारे कर्म यज्ञ में परिवर्तित हो जाते हैं और हमारा जीवन यापन हमारे बंधन का कारण नहीं बनता।

साधारण व्यक्ति: यह बंधन कैसा?

प्रचारक: वास्तविक्ता यह है, कि हम सब आत्माएँ हैं। भगवान श्रीमद् भगवद्-गीता में कहते हैं

देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र  न मुह्यति॥२.१३॥
जिस प्रकार शरीरधारी आत्मा एक शरीर के जीवमान में बाल्यावस्था से यौवन तथोपरांत वृद्धावस्था के परिवर्तन अनुभव करती है, मृत्यु के समय भी आत्मा देह का एक और परिवर्तन अनुभव करती है। धीर व्यक्ति इस परिवर्तन से विचलित नहीं होते।

इस श्लोक के अनुसार, हम आत्माओं ने शरीर धारण किया हुआ है। यह अनित्य भौतिक शरीर हमारे सभी दु:खों का कारण है। भूख, प्यास, जन्म, मृतयु, रोग व चिंता से ग्रस्त यह शरीर हमारे स्वाभाविक आनंद में व्यवधान है। अतेव वैदिक शास्त्रों में शारीर से मोक्ष प्राप्ति मनुष्य जीवन का एक प्रमुख्ख लक्ष्य बताया गाया हैं। मायामय संसार भौतिक आनंद का प्रलोभन देकर हमें उसकी वस्तुओं के पीछे भागने पर विवश करता है। हम काम पूर्ति की होड़ में अपना आध्यातमिक स्वरूप पूर्णतय: भूल जाते हैं और माया सुख के प्रति आकृषट हो जाते हैं। इस गातिविधी का परिणाम दु:ख के अतिरिक्त कुछ नहीं।

जब तक हमारे कर्मों का लक्ष्य शारीरिक सुख होगा, यह कर्म हमारे पुनर्जन्म का कारण होंगे और हमें भिन्न भिन्न शरीर धारण कर पुन: पुन: जन्म मृत्यु के चक्र में फसना पडे़गा। इस गंभीर परिस्थिति का एकमात्र निवारण है कर्मों को भगवान पर केंद्रित करना, जिसे यज्ञ कहते हैं। यज्ञ अर्थात, श्री विष्णु की तृप्ति। अतेव भगवान गीता में कहते हैं,

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधन:। ३.९
कर्म श्री विष्णु के यज्ञ हेतु होना चाहिेए अन्यथा भव बंधन उत्पन्न करता है।

साधारण व्यक्ति: हम मंदिर क्यों जाएँ? चढ़ावा क्यों चढ़ाएँ?

a11-folk-instructorप्रचारक: यह सृष्टीकर्ता की संरचना है कि ब्रह्माण्ड़ का संचालन अनेक देवताओं का उत्तरदायित्व है जिनमें से प्रमुख हैं इंद्र, चंद्र, सूर्य, वरुण, अग्नि, वायु, गणेश, नवग्रह इत्यादि। माँ दुर्गा सृष्टि, स्थिति और प्रलय का साधन हैं तथा ब्रह्म, विष्णु एवं शिव सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय के कर्ता।

भूमि पर भी सभी प्राकृतिक आवश्यअक्ताएँ देवताओं के शक्तिशालि, संघटित एवं सृष्टी के नियमों से अनुशािसित प्रयासों से संभव हो पिती हैं। मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे देवताओं को यज्ञ द्वारा अपना आभार प्रकट़ कर तृप्त करें। वेदों में यज्ञार्पण के विधानों में मंदिर निर्माण तथा नियमित मूर्ति सेवा का वर्णन है।

हम भूलोक के वासि हैं। हमारा देह मूलतय: भूमि धातु से निर्मित है। इस शरीर से हम उच्च ग्रहों मे वास करेने वाले देवताओं के सूक्ष्म शरीर को नहीं देख सकते। देवताओं का आकार इतना विशाल हैं कि उनके सम्मुख मनुष्य चींटि समान हैं। उनकी बुद्धिशक्ति भी हम मनुष्यों से कईं अधिक है। देवताओं को उनकी मूर्ति तथा उपयुक्त मंत्रों द्वारा सेवा अर्पित करने के विधान कर्मकाणड़ीय शासत्रों में दिये गये हैं।

इस कलि युग में बुद्धि क्षीण होने के कारण मनुष्य वेदों को नकार कर अहंकारि हो गये हैं और अपने तुच्छ ज्ञान के बल पर सृष्ट़ि के सभी नियामों का उल्लंघन करने पर उतारु हैं। उनके इस वैज्ञानिक विकास के कारण संपूर्ण पृथवि पर घोर संकट़ उमड़ उठा है। सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, वयक्तिगत, पर्यावरण, शैक्षिक इत्यादि सभी व्यवस्थाएँ तीव्र संघर्श की स्थिति में हैं। किसी भी क्षण विनाश हो सकता है। धर्म का उल्लंघन कर के तथा नास्तिकता को स्वीकार  करने से किसी का उद्धार नहीं हो सकता।

आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित, अंधकार में ढुलमुलता मनुष्य समाज यदि श्री चैतन्य महाप्रभु के सरल संकीर्तन मार्ग को स्वीकार कर ले, तो निश्चित ही पृथ्वि पर शांति और समृद्धि संभव होगि।

साधारण व्यक्ति: यह संकीर्तन मार्ग क्या है?

प्रचारक: श्री चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया है कि यदि हरे कृष्ण महामंत्र का सामूहिक कीर्तन किया जाए, तो भगवान कृष्ण तृप्त होंगे जिसके फलस्वरूप सभी देवता भी तृप्त होंगे, पृथवि समृद्ध होगी और सभी का मन शांत होगा। इस लिये संकीर्तन एक महान यज्ञ है।

साधारण व्यक्ति: केवल हरे कृष्ण मंत्र के उच्चारण मात्र से?

प्रचारक: हम कलि युग के वासी आध्यात्मिक दृष्टी से बलहीन हैं। तपस्या करने के लिये हम शिरीरिक और मानसिक शक्तियों से वंछित हैं। कलि युग की स्थिती को जानते हुए शासत्रों में हम लोगों के लिये बहुत सरल मार्ग का निर्धारण कया गया है जिसे श्री चैतन्य महाप्रभू ने हमे दिखाया है। हमें केवल मिल कर गान करना है,

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

यह संकीर्तन, भक्ति में प्रगति का सर्वश्रेष्ठ साधन है जो मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। इस साधना से हम धर्म का पूर्ण अनुसरण कर पाएँगे जिससे पूर्णपुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण संतुष्ट़ होंगे। सभी शासत्रों का कथन है कि वही कर्म सार्थक है जो भगवान को तृप्त कर सके।




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