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Thursday 20 July 2017
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हमारे कर्म: हमारे ही सुख दु:ख के कारण

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यदि मृत्यु पूर्ण विस्मृति है तो एक जीव अपने पूर्व जन्मों के दुष्कर्मो का दंड़ कैसे प्राप्त करता है?

भौतिक जगत कर्म के प्रबल नियमों द्वारा संचालित है। यह नियम धर्मानुसार कर्मों को पाप ओर पुण्य में विभाजित करते हैं। अपने कर्मों के अनुरूप, जीव को उनका फल भुगतना पड़ता है। यह फल हमें अनेक जन्मों के अंतराल में प्राप्त होते हैं। संसार में हमारे सुखद और दुखद परिस्थितयों का कारण हमारे पूर्व कर्म ही हैं। जन्म, ऐश्वर्य, बुद्धि और सौंदर्य हमारे कर्म के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं। अच्छे पूर्व कर्मों से यह जीव के पास प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं, पूर्व कुकर्मों से इनकी मात्रा अल्प होती है। समाज में दोनो वर्ग के व्यक्ति दिखते हैं – समृद्ध और दरिद्र।

यह कर्म फल अनेक जन्मों में कैसे प्राप्त होते हैं, इसका विवरण शासत्रों में मिलता है। संसार में जीव के सभी कार्यों के अनेक साक्षी हैं। वायु, जल, सूर्य और दिशिाओं से कुछ छुप नहीं सकता। सर्वप्रथम परमात्मा जो हर हृदय में विद्यमान हैं, जीव की हर इच्छा और कार्य के प्रमुख्ख साक्षी हैं।

सूर्य एक विशेष स्थान पर स्थित है लेकिन वह संसार के हर कोने से देखा जा सकता | उसी प्रकार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान भी वास्तव में  अपने गोलोक धाम में निवास करते हैं, परन्तु वे परमात्मा स्वरूप में हर व्यक्ति  के ह्रदय में दिखते है| उपनिषदों  में आत्मा और परमात्मा की उपमा  एक ही वृक्ष पर बैठे दो मित्र पक्षियों से की गई है ।

इनमे से एक पक्षी (आत्मा) वृक्ष के फल खा रहा है और दूसरा पक्षी  (कृष्ण) अपने मित्र को देख रहा है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है, अतः दोनो पक्षी समान गुण वाले हैं फिर भी इनमे एक पक्षी भौतिक  वृक्ष के फलों से मोहित है और दूसरा अपने मित्र के कार्यकलाप का साक्षी।

मुण्डक -उपनिषद (३.१.२) तथा श्वेताश्वतर-उपनिषद (४.७) इस तत्थय की पुष्टि करते हैं –

SB 1.3 1978 Plate 12-i

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोSनीशया शोचति मुह्यमानः
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ।।

अर्थात् – “यद्यपि दोनों पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं ,किन्तु फल खाने वाला पक्षी चिंता तथा विशाद में निमग्न है यदि किसी प्रकार वह अपने मित्र भगवान की ओर  उन्नमुख होकर उनकी  महिमा से अवगत होता है तो वह व्याकुल पक्षी तुरंत  समस्त  चिंताओं  से मुक्त  हो  जाता  है ” 

जीव को भले ही अपने पूर्व  जन्मों  के कर्मों का विस्मरण हो गया हो परन्तु  परमात्मा उसके सारे कर्मों के साक्षी हैं | एक व्यक्ति भले ही अपने बाल्यावस्था की गातिविधियों को भूल गया हो, परन्तु उसके पिता, जो उसके बाल्य जीवन के साक्षी हैं तथा उन्हें उसके वह कार्य याद रहते है| उसी  प्रकार जीवात्मा भी कई जन्मों में अनेक शारीरिक अवस्थाओं से गुजर चुकी है किंतु  क्रमागत कई भौतिक शरीर के परिवर्तन के उपरांत भी परमात्मा को उसके सारे कार्यकलापों का स्मरण होता है।

उपद्रष्टानुमन्ता भर्ता भोक्ता महेश्वर:
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुष: पर:२३॥

“इस शरीर में (जीव के अतिरिक्त) एक अन्य दिव्य भोक्ता हैं, परम् स्वामी जो उपद्रष्टा हैं तथा अनुमती देना वाले हैं और जिन्हे परमात्मा कहा जाता है।” भ. गी.  १३.२३

भगवद्गीता के इस श्लोक के अनुसार, परमात्मा जीव की हर शारीरिक अवस्था में उसके साथ रहते हैं परंतु उसके कार्यों में सम्मिलित नहीं होते। वे तो केवल साक्षी रूप में विद्यमान हैं। वे जीव की भौतिक इच्छाओं की तृपति उसके पूर्व कर्मों के आधार पर निर्धारित करते हैं। उनकी अनुमति के बिना कुछ संभव नहीं है। इस प्रकार परात्मा द्वारा जीव अपने पाप और पुण्य कार्यों का फल प्राप्त करता है।




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