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Sunday 1 August 2021
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श्री कृष्ण की दिव्यता और हमारा परम् कर्तव्य

श्री कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं –

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सो ऽर्जुन ॥भ० गी० ४.९ }

हे अर्जुन! जो मेरे जन्म तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जनता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे सनातन धाम को प्राप्त करता है।

अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान निष्क्रिय नहीं है। यदि कोई व्यक्ति भगवान के जन्म और  क्रियाओं को समझ लेगा तो वह आश्चर्य जनक परिणाम पाएगा। और वह क्या होगा? वह इस शरीर को छोड़ने के बाद दुबारा इस संसार में नहीं आयेगा।

कुछ लोग इस श्लोक में वर्णित “पुनर्जन्म नैति” का तात्पर्य समझते हैं की वह भगवान में लीन हो जाएंगे, परन्तु श्री कृष्ण कहते हैं की “पुनर्जन्म नैति मामेति” – अर्थात “वे इस भौतिक संसार में जन्म नहीं लेंगे तथा मेरे धाम में अपना नित्य स्थान पा लेंगे।” मात्र भगवान के अवतार और उनकी क्रियाओं को समझने से यह महान परिणाम संभव हो सकता है।

beautiful-baby-krishna-makhan-chorभगवान श्री कृष्ण इस पृथ्वी पर ५००० वर्ष पूर्व अवतरित हुए थे। श्री कृष्ण कहते हैं “जन्म कर्म च मे दिव्यम” अर्थात उनका अवतरण साधारण नहीं है। जिस प्रकार हम जन्म लेते हैं उस प्रकार श्री कृष्ण जन्म नहीं लेते। भगवत गीता में इसका वर्णन है।

जब भगवान अर्जुन को कहते हैं कि उन्होंने गीता का ज्ञान अनेकों वर्ष पूर्व सूर्यदेव को दिया था (भ० गी० ४.१), तो अर्जुन  श्री कृष्ण से प्रश्न करते हैं “मेरे प्रिय कृष्ण! तुमने यह पद्धति अरबों साल पहले सूर्य देव से कही थी, इस बात पर मैं कैसे विश्वास करूं? भला यह कैसे संभव है क्योंकि हम दोनो का जन्म लगभग साथ ही हुआ था।” (भ० गी० ४.४)।  इस पर श्री कृष्ण कहते हैं “हम दोनो अनेक बार साथ अवतरित हुए हैं, सिर्फ अंतर इतना है की मुझे सब जन्मों का स्मरण है परंतु तुम उन्हे भूल गए हो।” (भ० गी० ४.५)।

यही अंतर है ईश्वर और साधारण जीव में। कुल ८४ लाख योनियां हैं। जब तक हम इस संसार में रहेंगे ८४ लाख योनियों में घूमते रहेंगे परन्तु कृष्ण का जन्म ऐसा नहीं है इसलिए कृष्ण कहते हैं -“जन्म कर्म च मे दिव्यम्”। फिर कृष्ण कहते हैं “एवं यो वेत्ति तत्वतः” – जो मुझे जान सकता है तत्वतः अर्थात सत्य में, अल्पज्ञता से नहीं। और कौन सत्य रूप से भगवान को जान सकता है? कृष्ण कहते है -भक्त्या मामभिजानाति ॥भ० गी० १८.५५॥ अर्थात केवल भक्त ही मुझ भगवान को यथारूप जान सकता है। अतः यदि कोई कृष्ण को तत्तवत: जानना चाहता है तो उसे भक्ति मार्ग को अपनाना चाहिए।

दूसरी जगह श्री कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं –

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्तयुपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥९.२६॥

यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे,पत्र ,पुष्प,फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ ।

इस श्लोक में मुख्य यह है कि श्री कृष्ण भक्ति को स्वीकार करते हैं। सिर्फ यही एक योग्यता है -भक्ति। कृष्ण कहते  हैं “भक्तयुपहृतमश्नामी” ॥भ० गी० ९.२६॥ “भक्ति और विश्वास से प्रदान की गई भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।” तो हम भक्ति भाव से उनके द्वारा अपेक्षित वसतुओं को जब भगवान को अर्पित करते हैं तो भगवान उनहे ग्रहण करते हैं। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है की कृष्ण भूखे हैं अथवा उन्हे हमारे भेंट की आवश्यक्ता है। कृष्ण सभी जीवों को भोजन प्रदान करते हैं। हमें भक्तिपूर्वक अर्पण करने के बोधन में उनका उद्देश्य हमें हमारी आध्यात्मिक मूल वृत्ती में पुन: स्थापित करना है।

Krishna-and-the-gopas-cowherad-boys-eat-their-lunch-in-Vrindavan (2)उनके खाने की प्रक्रिया भी अलग है। कृष्ण की इन्द्रियां सर्वशाक्तिमान हैं। उनकी हर इंद्री में सभी इंद्रियों की क्षमता है। हम अपनी आँखों से केवल देख सकते है, पर कृष्ण अपनी आँखों से न केवल देख सतके हैं, वे उनसे खा भी सकते हैं। इस प्रकार के और कई उदहारण हैं। कृष्ण के द्वितीय पुरुषावतार गर्भोदकशायी विष्णु गर्भ समुद्र में लेटे हैं। सृशटी के समय ब्रह्माजी उनकी नाभि से उद्भव कमल पर जन्म लेते हैं। उनके समीप उनके चरण कमलों की सेवा करती सौभाग्य की देवी लक्ष्मीजी का इस क्रिया में कोई योगदान नहीं होता। हम समझते हैं की संतान उत्पन्न करने के लिए पिता और माता दोनों की आवश्यकता होती है। परन्तु ब्रह्माजी का जन्म मात्र भगवान की नाभि से हुआ। इसी को कहते हैं “सर्व शक्तिमान”। वे स्वयं ही संतान भी उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए वे कहते हैं “जन्म कर्म च मे दिव्यम्।”

कृष्ण हमारे ह्रदय में हैं, वे सर्वत्र व्याप्त हैं अतः वे कहीं से भी प्रकट हो सकते हैं। सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है इसका तात्पर्य यह नहीं की पूर्व दिशा सूर्य देव की जननी है। हम सच्चाई से सब कुछ जानना चाहेंगे तो ही हम समझ पाएंगे की भगवान क्या हैं।

brahma_and_narada_img.v1भगवत् ज्ञान का एक और पहलू है कि बुद्धि बल से भगवान को  समझना असंभव है। ब्रह्म संहिता में ब्रह्माजी कहते हैं,

पन्थास्तु कोटिशतवत्सरसंप्रगम्यो वायोरथापि मनसो मुनिपुंगवानाम् ॥ब्र०स० ५.३४॥

अर्थात यदि कोई अद्भुत विद्वान मुनी वायु के रथ पर सवार हो, मन की गति से कोटी वर्ष प्रयास करे तो भी वह भगवान श्री कृष्ण को  समझ नहीं सकता।

वेदेषु दुर्लभमदुर्लभमात्मभाक्तो॥ब्र०स० ५.३३॥ अर्थात वे कृष्ण जिन्हें वेदों से जानना असंभव है, शुद्ध भक्ति से उन्हें सरलता से जाने जा सकते हैं। यह स्थिति है –  भक्त्या मामभिजानाति ॥भ० गी० १८.५५॥ अर्थात केवल भक्ति द्वारा ही श्री कृष्ण को जाना जा सकता है।

कभी कभी यह कहा जाता है की भगवान का कोई नाम नहीं होता है। यह सत्य है। भगवान का नाम उनकी लीलाओं से संबंधित है। जैसे कृष्ण ने महाराज नन्द और यशोदा मैया का पुत्र बनना स्वीकार किया इसलिए उन्हें नंदनंदन या नंदलाला अथवा यशोदानंदन कहते हैं।

bhagavad-geeta copyवास्तव में श्री कृष्ण के माता पिता नहीं है। वे स्वयं ही सभी जीवों के माता पिता हैं लेकिन जब वे अवतरित होते हैं तो अपने किसी भक्त को माता पिता के रूप में स्वीकार करते हैं। कृष्ण आदि पुरुष हैं। यदि वे आदि पुरुष हैं तो क्या वे वृद्ध होंगे? नहीं। आद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च ॥ब्र०स० ५.३३॥ सबसे आदि और प्राचीनतम पुरुष होते हुए भी उनका रूप  नित्य नवयुवक का है। जब कृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमी पर थे तो वे अनेक पोतों के पितामह थे परंतु उनका रूप २० वर्ष के नवयुवक का था। सभी ने तस्वीर देखी होगी। ये हैं कृष्ण!

कृष्ण को समझने के लिए सिर्फ वेदों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है जबकि वेद कृष्ण को समझने के लिए ही बने हैं। भगवत गीता में कृष्ण कहते हैं -वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो ॥भ०गी० १५.१५॥ अर्थात सभी वेदों का लक्ष्य मुझे जानना है। परन्तु यदि हम कृष्ण को नहीं समझ पाते हैं तो वेदों के अद्धययन का क्या लाभ? किसी भी शिक्षा का आखिरी और चरम लक्ष्य है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान कृष्ण।

कृष्ण सभी कारणों के कारण हैं- सर्व कारण कारणम्॥ब्र० स० ५.१॥ जैसा की हम समझ सकते हैं कि मैं अपने पिता के कारण इस संसार में  हूँ। मेरे पिता अपने पिता के कारण इस संसार में हैं और इसी प्रकार जब हम सभी कारणों के मूल पर पहुंचते हैं तो गोविन्द को पाते हैं जिनका कोई कारण नहीं है -अनादिरादिरगोविन्दः ॥ब्र० स० ५.१॥ हम अपने पिता के कारण हो सकते हैं, परन्तु कृष्ण का कोई कारण नहीं वे समस्त कारणों के मूल कारण हैं।

कृष्ण सभी जीवों के पिता हैं। सभी जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान का अंश हैं। अतः हममे श्री कृष्ण के सभी गुण क्षुद्र मात्रा मे विद्यमान हैं। परन्तु कृष्ण सर्वोच्च हैं। सभी दिव्य गुण उनमें पूर्णता में विद्यमान हैं। वे पूर्ण हैं और हम अपूर्ण हैं, यही अंतर है  हममे और श्री कृष्ण में।

हम कृष्ण का अंश भाग हैं। इस ज्ञान का हमारे जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।  जैसे हाथ हमारे शरीर का अंश है तो स्वाभाविक है कि हाथ शरीर द्वारा नियंत्रित होगा।  उसी प्रकार जब हम कृष्ण का अंश हैं तो हमे कृष्ण द्वारा नियंत्रित होना चाहिेए। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम कभी प्रसन्न नहीं हो सकते। यदि किसी मशीन से उसका कोई पेंच निकल कर गिर जाए तो उस पेंच की कोई महत्व नहीं होती, उस पेंच का महत्व तभी तक है जब तक वह मशीन से जुड़ा हुआ है। अतः हमे स्वेच्छा से कृष्ण द्वारा नियंत्रित होना स्वीकार करना चाहिए तभी हम जन्म, मृत्यु, बुढापे तथा रोग के दु:खों से मुक्त हो पाएंगे और आध्यात्मिक जगत को प्राप्त कर पाएंगे। यहाँ ‘स्वेच्छा ‘ शब्द महत्वपूर्ण है। हमे थोड़ी सी जो स्वतंत्रता मिली है कृष्ण उसमे व्यवधान उत्त्पन्न नहीं करना चाहते। तभी वह अर्जुन से कहते हैं “यथेच्छसि तथा कुरु”॥भ० गी० १८.६३॥ “तुम जैसा चाहते हो वैसा करो।” हमें अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता श्री कृष्ण ने प्रदान की है।

हमारि स्थिति यह है कि हम अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर, संसारिक सुखों का भोग करने की लालसा से, इस भौतिक संसार में आ तो गए परन्तु उसका परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ की हम इस संसार में बद्धित हो गए। प्रकृति के कठोर नियमों ने हमें जकड़ लिया और दु:खों से घेर लिया। 

हम इस संसार मे स्वामी बनना चाहते हैं – कोई देश का, कोई कार्यालय का तो  कोई घर का। कोई सेवक बनना नहीं चाहता। सिर्फ वैष्णव ही हैं जो सेवक बनना चाहते हैं। नकली स्वामी बनने का लाभ ही क्या? यदि हम वास्तविक स्वामी होते तो ग्रीष्म ऋतू में हमें पंखे की आवश्यकता क्यों होती है? उसका तातपर्य यह हुआ की हम ग्रीष्म ऋतू के आधीन हैं। उसी प्रकार हम शीत ऋतु के भी आधीन हैं। हम वास्तव में दास ही हैं। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं – जीवरे स्वरुप हौय नित्येर कृष्ण दास ॥चै०च० म०ली० २०.१०८-१०९॥ हमारी वास्तविक स्थिति यही है की हम कृष्ण के नित्य दास हैं। यदि हम वास्तव में स्वामि होते तो हमारा इस संसार में पतन क्यों होता? भगवान का कभी पतन नहीं होता है क्योंकि वो ‘अच्युत’ हैं जबकि जीव ‘च्युत’ हैं।TA0504 copy

इस भौतिक संसार में हम जितना नियंत्रण करने का प्रयास करेंगे जितना स्वामी बनने का प्रयास करेंगे उतना ही उलझते जायेंगे। यज्ञार्थात्कर्मणो ऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ॥भ० गी० ३.९॥ यदि हम यज्ञ पुरुष के लिए कार्य नहीं करेंगे तो इस भौतिक संसार में उलझते जायेंगे। अतः बुद्धिमत्ता इसी में है हम कृष्ण को आत्मसमर्पण कर दें। श्री कृष्ण के जन्म दिवस के अवसर पर हमारा परम् कार्य श्री कृष्ण के चरणों का संरक्षण स्वीकार करना होना चाहिये।




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