Philosophy

श्रद्धा

जब एक व्यक्ति ट्रेन में सफर करने के लिए टिकट खरीदता है, तो वह आशवस्त होता है, कि यादि वह सही ट्रैन में बैठे तो अवश्य अपनी मंज़िल पर पहुँचेगा। उसे ट्रेन व्यवस्था पर संपूर्ण विश्वास होता है। इसी विश्वास को श्रद्धा कहा जाता है। ज्ञान के क्षेत्र में भी विद्यार्थी अध्यापक, तथा पुस्तकों को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करते हैं।time-management-1966420_1920

आध्यात्मिक जीवन में श्रद्धा

Srila-Prabhupada-preaching-with-finger-pointing-up copyआध्यात्मिक जीवन में विशेषकर, शिष्य का गुरू तथा शासत्र के प्रति अटूट श्रद्धा  होना अनिवार्य है। यदि कोई श्रील प्रभुपाद से श्रीमद् भगवद्गीता का ज्ञान श्रद्धापूर्वक सुनें तो उन्हे आभास होगा कि शरीर और मन आत्मा से भिन्न हैं तथा जब तक आत्मा की तृप्ती नहीं होति जीवन का संतुष्ट और सार्थक होना असंभव है। यदि शासत्रों और आचार्यों को श्रद्धा से स्वीकार करें तो आत्मा के सत् चित् आनंद स्वरूप का एहसास होगा तथा जीवन की दिव्य दिशाएँ खुलेंगी। 

 

भौतिक जीवन का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य

साधारणतय: लोग शारीरिक और मानसिक आवश्यक्ताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ती में मग्न रहते हैं। इस कारण उनका जीवन संघर्षमय होता है। वे सदा चिंताग्रस्त रहते हैं क्योंकि भौतिक सब तात्कालिक है। सुखद और अपेक्षित परिस्थितियों का अतं होना  निश्चित है तथा यह आशंका उनकी निरंतर चिंता का कारण होती है। अंतत: मृत्यु का एक व्यक्ति की संपत को पूर्णतय: हर लेना भी निश्चित है। इस लिए भौतिक जगत में हर व्यक्ति अविरत मृत्यु के आतंक में जीता हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण करने का परिणाम भौतिक जगत की क्षणभंगुर वास्तविक्ता का साक्षातकार तथा माया के भ्रम से मुक्ति है।

श्रद्धा का लाभ

यदि कोई श्रील प्रभुपाद के द्वारा दीये गये ज्ञान तथा साधना का अनुशासित रूप से अनुसरण करे, तो वह दिव्य सत्ता का अनुभव करेगा। उस शाश्वत अस्तित्व के अनुभव से इस जगत की हर अवस्था में मन शांत और निश्चिंत रहेगा। भक्ति योग के अभ्यास से जीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण के साथ अपना सनातन संबंध समझ पाएगा और इस पथ पर अग्रसर होने से अनंत प्रेम का आनंदमय अनुभव करेगा। यही जीवन की सार्थकता है। आज समाज में श्रील प्रभुपाद की दिव्य वाणी पर श्रद्धा होना अत्यंत आवश्यक है। एकमात्र यही सुख और शांति का उपाय है।

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