• Philosophy

    कृष्ण का संरक्षण 

    क्या कभी किसी ने अकेले आनंद का अनुभव किया है? नहीं न? यह इसलिये है क्योंकि आनंद का अनुभव करने के लिए कम से कम दो लोगों की आवश्यकता  होती है। जब हम, अर्थात जीवात्मा, परमपुरुषोत्तम भगवान श्री कृषण की भक्तिपूर्वक सेवा करते हैं, तो हम उस पवित्र प्रेममय सेवा से उत्पन्न परमानंद की अनुभूती करते हैं। अब प्रश्न है कि हम अपने हृदय में परमात्मा स्वरूप विद्यमान श्री कृष्ण का अनुभव क्यों नहीं कर पाते? इसके लिये सबसे पहले हमें यह समझाना होगा कि हम उनके अंश हैं।  वास्तव में हमारा स्वरुप आनंदमय है। सभी ने कृष्ण की तस्वीर देखी होगी। वे कभी गोप गोपियों के मध्य, कभी गाँय…

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    श्री कृष्ण की दिव्यता और हमारा परम् कर्तव्य

    श्री कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं – जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सो ऽर्जुन ॥भ० गी० ४.९ } हे अर्जुन! जो मेरे जन्म तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जनता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे सनातन धाम को प्राप्त करता है। अर्थात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान निष्क्रिय नहीं है। यदि कोई व्यक्ति भगवान के जन्म और  क्रियाओं को समझ लेगा तो वह आश्चर्य जनक परिणाम पाएगा। और वह क्या होगा? वह इस शरीर को छोड़ने के बाद दुबारा इस संसार में नहीं आयेगा। कुछ लोग इस श्लोक में वर्णित…